Tuesday, April 03, 2007

कुछ भाव ...

आज भी मन की सतह पे उसी तरह संघर्ष जारी है ..................

नीरंतर ही मन भ्रमण करता है
छोर की अन्तीम वीरः तक

पथ के साथ चल कर भी
अनभिग्य रहा मंज़िल से

शब्दो में उलजा हुआ
ढूढ़ रह हू भावो को.....

समय ने मुझे बहुत तराशा है, बहुत से अनुभव एवं अनुभूतीया दी है । जीवन से बहुतायत रोश या आत्मग्लानी तो नही, मगर फिर भी आज भी मन की सतह पे उसी तरह संघर्ष जारी है ........



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